नैतिक चेतना का विस्तार …

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अक्सर इस तरह की चर्चा होती है कि उसने उसके साथ ऐसा कर दिया, उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था | हर मनुष्य के जीवन का मूल्य है अतः सरकार को उस ‘अंतिम मनुष्य’ का ख्याल रखना चाहिए | इस नदी को  साफ़ रखना चाहिए वरना लोग कई तरह की  बिमारियों से ग्रस्त हो जायेगे | ये पेड़ लगाना चाहिए, ये मानव के लिए बहुत महत्वपूर्ण है | विकसित राष्ट्रों को विकासशील राष्ट्रों के संशाधनो  पर कब्ज़ा नहीं जमाना चाहिए |संपन्न वर्ग को विपन्न वर्ग के हकों को नहीं छिनना चाहिए, इत्यादि | नैतिक मूल्यों की बातें हमेशा मनुष्य के दूसरे मनुष्यों के साथ  संबंधों को ध्यान में रख कर की जाती है | मनुष्य के नैतिक कर्तव्यों का विस्तार केवल मनुष्य तक ही है ,इस से परे देखने की जरूरत नहीं | मनुष्य से इतर हम जगत के अन्य घटकों के बारे में तब सोंचना शुरू करते है जब वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मनुष्य को  प्रभावित करता हो, अन्यथा नहीं  | अतः हमारे पर्यावरण के अन्य घटकों का महत्व मनुष्य के लिए उपयोगी होने में है | अन्य घटक कभी भी अपने आप में मूल्यवान नहीं होतें बल्कि हमेशा मनुष्य की जरूरतों  के आधार पर उनका मूल्य निर्धारित होता है | सागौन के  पेड़ का अगर आर्थिक महत्व है तो उसे  खूब  लगाओ और सड़क के किनारें अपने  आप पनपी कोई झाड़ी है तो उसे उखाड़ दो | गंगा नदी का धार्मिक और  आर्थिक महत्व है तो उसे खूब “क्लीन” करो ,उसके लिए आयोग बनाओ ,समितिया बनाओ ,बेहिसाब तकनीक ,फाइले ,बजट, कंपनी नदी के मूह में ठूस दो |उसे समाजवादी तकनीक से क्लीन करो ,पूंजीवादी तकनीक से क्लीन करो ,मंडल कमंडल की तकनीक से क्लीन करो और इन सब तकनीको का बाप भ्रष्टाचार की तकनीक तो है ही |और बाकी  नदिया जो ‘ब्रांडेड’ नहीं है वो कब का सूख रही है या  सूखने के कगार पे है ,उसे वैसे ही छोड़ दो |क्या इन नदियों, पहाड़ो, फूलों ,झरनों, पशुओ और पक्षिओ का अपने आप में कोई मूल्य नहीं होता ? क्या  हम उसे अपने रौ में पुष्पित-पल्लवित होने नहीं दे सकते ? क्या नदी को  अपने रास्ते पर बहने अधिकार नहीं है  ,क्यों उसपे बैराज और पुल बनाकर हम उसके स्वाभाविक  रास्ते को रोकते है ,क्यों उसका रास्ता बदल देते है, क्यों हम उस पर बाँध बनाते है ,क्या हम अपनी बिजली की प्यास को थोडा कम नहीं कर सकतें ? क्या फूलों को अपने खिलने  की आवधि तक पौधों पे रहने अधिकार नहीं होता ,क्यों उसे तोड़ कर हम अपने देवता के कदमो में चढ़ा देते है ,क्या हमारी धार्मिक भावनाएं उस फूल के जीवन की बलि लेने की मोहताज है ,क्या सच में हमारा इश्वर इस से प्रसन्न होता है ?

क्या अपनी नैतिक चेतना को केवल मनुष्य तक सीमित रखना उचित है , क्या आपको नहीं लगता की उसका विस्तार प्रकृति के अंतर्गत सम्मिलित अन्य घटकों  तक होना चाहिए ? क्या ग्लोबल वार्मिंग की तरफ ध्यान न गया होता तो मनुष्य पूरी पृथ्वी को पशुओ, जंगलो और फूलों  से विहीन कर देता ???

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